Tuesday, 3 January 2017

Aarthik vimudrikaran

काला धन घोटाला (ब्लैक मनी स्कैम), जो कभी कभी'वाश वाश घोटाले'के रूप में भी जाना जाता है, एक ऐसा घोटाला है जहां परिचालन करने वाला चोर कलाकार शिकार व्यक्ति से धोखाधड़ी से धन प्राप्त करने का प्रयास उसे यह समझा बुझाकर करता है कि बैंकनोट के आकार के कागज़ का अम्बार जो संदूक अथवा तिजोरी में सुरक्षित धरा है वह वास्तव में का ले रंग से रंगा गया है (उदाहरणार्थ, सीमा शुल्क द्वारा पता लगाने से बचने के लिए). शिकार व्यक्ति को कागजी मुद्रा के धोने हेतु रसायनों के भुगतान के लिए राजी किया जाता है इस वादा के साथ कि आय में उसे भी हिस्सा मिलेगा.

काला धन घोटाला (ब्लैक मनी स्कैम) पहली बार वर्ष 2000 के आसपास दिखाई दिया. यह अग्रिम शुल्क की धोखाधड़ी के रूप में जानी जाने वाली एक और भिन्नता है।

सरकार द्वारा पांच सौ और एक हजार के नोट बंद किये जाने का निर्णय कहीं निर्दोष तो कहीं सदोष है. उसके शुभ-अशुभ परिणाम होना स्वाभाविक है. इस निर्णय के फलस्वरूप भ्रष्टाचार, कालाधन आदि बुराइयों पर होने वाला संभावित नियंत्रण शुभ-परिणाम दायक है जबकि इसके क्रियान्वयन में आने वाली कठिनाइयां, जनसाधारण को होने वाली परेशानियां इसके तात्कालिक कष्टों की साक्षी हैं. जनता जनार्दन ने इस तथ्य को समझा है और इसीलिए वह सारी असुविधाओं और परेशानियों के वावजूद इस निर्णय का दूर तक स्वागत कर रही है.
एक हजार और पांच सौ के नोट बंद किये जाने के निर्णय को ‘आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक' का नाम दिया गया है. यह नाम दूर तक सार्थक भी लगता है, क्योंकि जिस प्रकार पाक-आक्रान्त कश्मीर में स्थित आतंकी शिविरों के विरूद्ध हुई सैन्य सर्जिकल स्ट्राइक से पाकिस्तान प्रभावित हुआ उसी प्रकार आर्थिक सर्जि‍कल स्ट्राइक से कालेधन के रक्षक कुबेर आहत हुए
सरकार द्वारा पांच सौ और एक हजार के नोट बंद किये जाने का निर्णय कहीं निर्दोष तो कहीं सदोष है. उसके शुभ-अशुभ परिणाम होना स्वाभाविक है. इस निर्णय के फलस्वरूप भ्रष्टाचार, कालाधन आदि बुराइयों पर होने वाला संभावित नियंत्रण शुभ-परिणाम दायक है जबकि इसके क्रियान्वयन में आने वाली कठिनाइयां, जनसाधारण को होने वाली परेशानियां इसके तात्कालिक कष्टों की साक्षी हैं. जनता जनार्दन ने इस तथ्य को समझा है और इसीलिए वह सारी असुविधाओं और परेशानियों के वावजूद इस निर्णय का दूर तक स्वागत कर रही है.




कालेधन के विरूद्ध सरकार के इस कदम पर आज देश का जनमानस दो वर्गों में विभक्त है. एक ओर वह बड़ा वर्ग है जिसके पास कालाधन नहीं है.  निर्दोष होकर भी वह कालेधन के कुबेरों के पापों का फल भोगने को विवश है. यह वर्ग परेशान होकर भी सरकार के साथ है क्योंकि वह निर्णय की गंभीरता और व्यावहारिक क्रियान्वयन की कठिनाइयों की विवशता को समझता है. दूसरी ओर वे लोग हैं जिन्होने पिछले सात दशकों में अपने घर भरे हैं. वर्तमान सरकार के बार-बार कहने पर भी अपनी काली कमाई उजागर नहीं की और अब नोटों के रद्दी में बदल जाने पर कटे पंछी से फड़फड़ा रहे हैं. अधिकांश विपक्षी नेता भी निहित स्वार्थों के लिए इस वर्ग की आहत भावनाओं को स्वर देकर राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हैं. क्रियान्वयन की कठिनाइयों में आई परेशानियों ने उन्हें जनता को होने वाली असुविधा के नाम पर राजनीति करने का अवसर भी उपलब्ध करा दिया है और वे भड़काऊ भाषण देकर देश की शांति भंग करने, सरकार की छवि बिगाड़ने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं

No comments:

Post a Comment